1, हर कोई कुछ न कुछ कहना चाहता है अपने मन की बात- हर कोई सुनना चाहता है किसे से अपने मन की बात यह मौन संवादों के संबंध अपने होने के रहस्य को नहीं बताते हर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष की देह की रक्षा करता असीम फैला फन विष्णु की शैय्या पर समर्पित होता है । 2, टूटते बंटते अखरोट धीरे धीरे बहता बर्फ के पहाडों से जल दो किनारों को मिलाती सुक्ष्म कर्मों सहित रहित पानी पर तैरती कश्ती हरे और सूखे पत्ते का लगातार मौन निमंत्रण लोगों से घिरी पिसती सडकें चमकता सूर्य खुला आकाश दे ही रहें हैं कुछ न कुछ- इन्हें मोक्ष मांगते हुए मैनें कभी नहीं देखा ।
56 likes
20 shares