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Diya Verma Family · Marathi · Family

============================ दरवाज़ों पे खाली तख्तियां अच्छी नहीं लगती, मुझे उजड़ी हुई ये बस्तियां अच्छी नहीं लगती ! चलती तो समंदर का भी सीना चीर सकती थीं, यूँ साहिल पे ठहरी कश्तियां अच्छी नहीं लगती ! ताल्लुक बोझ लगता है तो कह दो दुनिया से, तेरे लहजे में लेकिन तल्खियां अच्छी नहीं लगती ! खुदा भी याद आता है ज़रूरत पे यहां सबको, दुनिया की यही खुदगर्ज़ियां अच्छी नहीं लगती ! उन्हें कैसे मिलेगी माँ के पैरों के तले जन्नत, जिन्हें अपने घरों में बच्चियां अच्छी नहीं लगती ! ==============================

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