उसका मेरा अजनबी का रिश्ता ही रहा मैं मंजिल न बना, उम्र भर रस्ता ही रहा इतने आंसू न दिए ज़िन्दगी ने मुझे हार कर मैं अपने ग़मों पे हँसता ही रहा उसने कोई और ज़मी की ख्वाहिश न करी वो जो बादल था मेरी छत पे बरसता ही रहा कौन करता है किसी और की तमन्ना पूरी मैं नवाकिफ था चिरागों को घिसता ही रहा हम समझते थे जिसको कि वो खुश है हमसे वो किसी और की हसरत मैं तरसता ही रहा ज़ख्म सारे जो मिले भर ही चले हैं अब तो एक उसका ही ज़ख्म बाद तक रिसता ही रहा💝💝💝💝💝💝💝💝💝
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