एक गज़ल,,,,, ================ दिलॊं कॆ हौसले देखें घटाओं से ज़रा कह दॊ ।। जलाये हैं चरागों को हवाओं से ज़रा कह दॊ ।। (१) तुम्हॆं मॆरी इबादत की कसम है मिरे क़ातिल, नहीं पालें भरम क़ातिल अदाओं से ज़रा कह दॊ।। (२) घनी ज़ुल्फ़ॆं मुझॆ बांधॆं इरादा तॊड़ दॆं मॆरा, नहीं पालॆं भरम क़ातिल अदाऒं सॆ ज़रा कह दॊ !! (३) मिलूँगा मैं गरीबों की दुआ में रोज तुमको अब, बुला लेंगी मुझे अपनीं वफाओं से ज़रा कह दॊ ।। (४) शहर सारे हुये पत्थर दिलों में रंज है भारी, इमारत मत बनें वॊ आज गाँवों से ज़रा कह दॊ ।। (५) यही है आरज़ू मॆरी किसी का दिल न रॊयॆ अब, बदल जायॆं भलॆ मौसम अलावॊं सॆ ज़रा कह दॊ !! (६) हुआ जीना यहाँ दुस्वार अब हम पॆ रहम करदॆं, मियाँ हर साल आतॆ इन चुनावॊं सॆ ज़रा कह दॊ !!(७) अभी तक ज़ख्म दिल कॆ भर नहीं पायॆ पुरानॆ ही, क़तारॊं मॆं खड़ॆ नाराज़ घावॊं सॆ ज़रा कह दॊ !! (८) अगर ये पैर की जूती बगावत पे उतर आई तो, कभी सिर पे चढ़ेगी "राज़" पावों से ज़रा कह दॊ ।।(९) "राज़ बुन्देली"
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