कभी लड़कर भी देखो शायद कुछ सह पाओ यूँ सोते सोते तो कोई लड़ता नहीं त्रिशूल कोई भी अपने आप गड़ता नहीं ज़मीं बहुत बन चुके हो रक्त में बहुत सन चुके हो अब नदी बनो, शायद बह पाओ कभी लड़कर भी देखो शायद कुछ सह पाओ ये मौन धारण कब तक करोगे अहिंसा का उदहारण कब तक बनोगे जाने कितने हाथ कटवा चुके हो अपने ही चिथड़े बंटवा चुके हो कब देखोगे अपनी नब्ज़ जो डूब रही है हर पल घिसटते हुए ये पूँछ रही है कब तक इक पल की तरह बीतोगे कब तक इस आग में यूँ ही भीगोगे मौसम बनो, शायद कुछ रह पाओ कभी लड़कर भी देखो शायद कुछ सह पाओ क्या हम यूँ ही लुटते रहेंगे बाहर से, अन्दर से यूँ ही पिटते रहेंगे कब हलक से हमारे आवाज़ निकलेगी कब बर्फ ये डर की हमारे अन्दर पिघलेगी किस बात का खौफ, किस बात से डरते हैं हम कभी रोटी कभी पानी के लिए रोज़ ही मरते हैं हम जो भी मिलता है हमको एहसान या भीख लगती है कभी आवाज़ निकलती भी है तो वो चीख लगती है गीत बनो, शायद कुछ कह पाओ कभी लड़कर भी देखो शायद कुछ सह पाओ💝💝💝💝💝💝
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