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Vanya Kapoor Good_Morning · Hindi · Good_Morning

मैं छांव—छाव चला था अपना बदन बचाकर कि रूह को एक खूबसूरत—सा जिस्म दे दूं न कोई सिलवट, न दाग कोई न धूप झुलसे, न चोट खाए न जख्म छुए, न दर्द पहुंचे बस, एक कुंवारी सुबह का जिस्म पहना दूं रूह को मैं मगर तपी जब दुपहर दर्दों की, दर्द की धूप से जो गुजरा तो रूह को छाव मिल गयी है अजीब है दर्द और तस्कीन का साझा रिश्ता मिलेगी छांव तो बस कहीं धूप में मिलेगी

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