मियाँ मैं शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती मियाँ मैं शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती मैं लहजा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती मैं इक दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़ुवाहट नहीं जाती जहाँ मैं हूँ वहीं आवाज़ देना जुर्म ठहरा है जहाँ वो है वहाँ तक पाँव की आहट नहीं जाती मोहब्बत का ये जज़बा जब ख़ुदा क्जी देन है भाई तो मेरे रास्ते से क्यों ये दुनिया हट नहीं जाती वो मुझसे बेतकल्लुफ़ हो के मिलता है मगर ‘राना’ न जाने क्यों मेरे चेहरे से घबराहट नहीं जाती.
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