मस्जिद पे गिरता है मंदिर पे भी बरसता है.. ए बादल बता तेरा मजहब कौनसा है........।। इमाम की तू प्यास बुझाए पुजारी की भी तृष्णा मिटाए.. ए पानी बता तेरा मजहब कोन सा है.... ।। मज़ारो की शान बढाता है मुर्तीयों को भी सजाता है.. ए फूल बता तेरा मजहब कौनसा है........।। सारे जहाँ को रोशन करता है सृष्टी को उजाला देता है.. ए सुरज बता तेरा मजहब कौनसा है.........।। मुस्लिम तूझ पे कब्र बनाता है हिंदू आखिर तूझ में ही विलीन होता है.. ए मिट्टी बता तेरा मजहब कौनसा है......।। ऐ दोस्त मजहब से दूर हटकर, इंसान बनो क्योंकि इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता... ।।💝💝💝💝💝💝
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