वो हँस के मिले हम से हम प्यार समझ बैठे बेकार ही उल्फ़त का इज़हार समझ बैठे ऐसी तो न थी क़िस्मत अपना भी कोई होता, क्यूँ ख़ुद को मुहब्बत का हक़दार समझ बैठे रोएँ तो भला कैसे खोलें तो ज़ुबाँ क्यूँ कर, डरते हैं कि जाने क्या संसार समझ बैठे
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