ज़माने में मोहब्बत यूँ अगर आबाद न होती न तू होती न मैं होता हमारी बात न होती जमाले-हुस्न से तेरे मेरा दिल था कभी रौशन तेरा गर साथ रहता फिर यहाँ पर रात न होती ज़मीं और आसमाँ के दरम्याँ कुछ तो मोहब्बत है अज़ाब – ए – अब्र से वरना कभी बरसात न होती सियासत मुल्क़ में करता खड़ी नफ़रत की दीवारें वगरना दो दिलों में इस क़दर ये आग न होती शरीफ़ों से उसे इज्ज़त की रोटी का तसव्वुर था वो रख कर जिस्म गिरवी,खाने की मोहताज़ न होती तेरी बातों का कोई भी असर होगा नही ‘कुंदन’ ग़ज़ल से फ़र्क पड़ता तो ,तो ये हालत आज न होती !
24 likes
66 shares