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Meera Kumar Social · Hindi · Social

कभी रोटी के लिए बिलखना पड़ता हैं, कभी पानी के लिए झगड़ना पड़ता हैं, पेट की आग में कई बार हद से ज्यादा तड़पते हैं, फिर भी भुखे रहकर संतुष्ट होना पड़ता हैं, सपने तो सबकी आँखों में पलते हैं, गरीबी में अक्सर उन्हें तोड़ना पड़ता हैं, अरमान तो सबके दिलों में सजते हैं, लाचारी में अक्सर उन्हें कुचलना पड़ता हैं, दुःख से रोने के कारण तो हजार बनते हैं, पर बैबसी में अक्सर आँशुओं को छुपाना पड़ता हैं, बिना कारण कई बार जीवन में बैईज्जत होते हैं, फिर भी मजबुरी में अक्सर सर झूकाना पड़ता हैं, बातों में हमदर्द बनने वाले दिन में सैकड़ों मिलते हैं, पर गरीबी की इस बिमारी को खुद ही सहना पड़ता हैं, किससे कहें बिना मतलब के लोग कहाँ सुनते हैं, अपनों हालातों से खुद ही उलझना पड़ता हैं, रटे-रटाएं किस्से सबके जुबाँ पर सजते हैं, रोजमर्रा की परेशानियों से खुद ही निपटना पड़ता हैं, नरम सोफे पर बैठकर लोग गरीबों का दर्द समझते हैं, गरीबी की बदतर जिन्दगी में रोज खुद ही जीना पड़ता हैं

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