कर्णधार तू बना तो हाथ में लगाम ले क्राँति को सफल बना नसीब का न नाम ले भेद सर उठा रहा मनुष्य को मिटा रहा गिर रहा समाज आज बाजुओं में थाम ले त्याग का न दाम ले दे बदल नसीब तो ग़रीब का सलाम ले यह स्वतन्त्रता नहीं कि एक तो अमीर हो दूसरा मनुष्य तो रहे मगर फकीर हो न्याय हो तो आर-पार एक ही लकीर हो वर्ग की तनातनी न मानती है चाँदनी चाँदनी लिए चला तो घूम हर मुकाम ले त्याग का न दाम ले दे बदल नसीब तो ग़रीब का सलाम ले
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