*खुशियाँ कम और अरमान बहुत हैं ।* *जिसे भी देखो परेशान बहुत है ।।*♨ *करीब से देखा तो निकला रेत का घर ।* *मगर दूर से इसकी शान बहुत है ।।*♨ *कहते हैं सच का कोई मुकाबला नहीं ।* *मगर आज झूठ की पहचान बहुत है ।।*♨ *मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी ।* *यूं तो कहने को इन्सान बहुत हैं ।।*♨
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