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Aadhya Mehta Social · Hindi · Social

दोस्तो बहुत दिनों से एक विचार मेरे मन में घर कर रहा है कि आखिर अपना समाज किधर जा रहा है क्या हम वाकई इंसान कहलाने लायक हैं।मेरी कलम में कहाँ तक सत्यता है आप लोगों के लाइक और उसके ऊपर आये कमेंट्स से पता चलेगा। इंसानों की बस्ती मिलजुल के रहना छोड़ दिया है< इंसानों की बस्ती में। अब बात बात पर झगड़ा करते< " " " "। अब नही बड़ो का आदर करते< " " " "। अब गलत बात में साथ वो देते< " " " "। अब मेहनत करना छोड़ दिया है< " " " "। ईमान बेचते यहां लोग भी देखे< " " " "। हमने कन्या भ्रूण मिटाते देखे< " " " "। वोट की खातिर नोट बांटते हमने देखे< " " " "। हमने मदिरा खूब पिलाते देखे < " " " "। दहेज की खातिर नई बहू को जलते देखा। " " "। बाबा भेष में बहसी यहां देखे< " " " "। खूब खिलाड़ी बिकते देखे< " " " "। खूब रिश्वत लेते अफसर देखे < " " " "। खूब नेता लिप्त घोटाले देखे< " " " "। कौली जैसे यहां नरभक्षी देखे< " " " "। हमनें बलात्कार भी बस में देखे< " " " "। कोर्ट निर्णय खूब बदलते देखे< " " " "। < इंसानो की बस्ती में।

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