ये इंसा है केवल चमन देखता है सरे राह बेपर्दा तन देखता है हवस का पूजारी हुआ जा रहा है कली में भी कमसिन बदन देखता है ज़लालत की हद से गिरा इतना नीचे कि मय्यत पे बेहतर कफन देखता है भरी है दिमागों में क्या गन्दगी सी ना माँ-बाप भाई-बहेन देखता है बुलन्दी की खाहिश में रिश्ते भूला कर मुक़ददर का अपने वज़न देखता है ख़ुदी मे हुआ चूर इतना कहें क्या पड़ोसी के घर को रहन देखता है नहीं तेज़ तूफानो का खौ़फ रखता नहीं वक्त़ की ये चुभन देखता है हर एक शख्स इसको लगे दुश्मनों-सा फिजा़ओं में भी ये जलन देखता है हवस की हनक का हुनर इसमे उम्दा ज़माने को खुद सा नगन देखता है
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