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Myra Kumar Life · Marathi · Life

श्री शिवाष्टकम् स्तोत्रम् ◆जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे । ◆जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे ॥ ◆जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे । ◆जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे ॥ ◆निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे। पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥1॥ ◆जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे । ◆मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे ॥ ◆जय त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे । ◆काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे ॥ ◆नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे। ◆पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥2॥ ◆जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो । ◆किस मुख से हे गुरातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो ॥ ◆जय भवकार, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो । ◆दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाधर दया करो ॥ ◆पार लगा दो भव सागर से, बनकर करुणाधार हरे। ◆पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥3॥ ◆जय मन भावन, जय अति पावन, शोक नशावन शिव शंभो । ◆विपद विदारन, अधम उबारन, सत्य सनातन शिव शम्भो ॥ ◆सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो । ◆मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो ॥ ◆विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे। ◆पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥4॥ ◆भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी । ◆निमिष मात्र मेँ देते है नवनिधि मन मानी शिव योगी ॥ ◆सरल हृदय अति करुणा सागर अकथ कहानी शिवयोगी । ◆भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी शिव योगी ॥ ◆स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे। ◆पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥5॥ ◆आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना । ◆विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छड़ा देना ॥ ◆रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना । ◆दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों मेँ लगन लगा देना ॥ ◆एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे। ◆पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥6॥ ◆दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो । ◆शक्तिवान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो ॥ ◆त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो । ◆परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो ॥ ◆स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे । ◆पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥7॥ ◆तुम बिन ‘बेकल’ हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे । ◆चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे ॥ ◆विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे । ◆आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ भगवंत हरे ॥ ◆मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे । ◆पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे ॥8॥ ◆शिवाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ । ◆शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सः मोदते ॥ ॥ इति श्री शिवाष्टक स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

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