अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ .... अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा; जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा; मरने की, अय दिल, और ही तदबीर कर, कि मैं; शायान-ए-दस्त-ओ-बाज़ु-ए-का़तिल नहीं रहा; वा कर दिए हैं शौक़ ने, बन्द-ए-नकाब-ए-हुस्न; ग़ैर अज़ निगाह, अब कोई हाइल नहीं रहा; बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर असद ; जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वो दिल नहीं रहा। ~ Mirza Ghalib
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