मेरी खामोशी में मै बहुत कुछ केहना चाहता हु... गुजरे हर पल को याद करके भुलना चाहता हु... याद है वो हर एक लम्हा जिसे मैने बहुत जिया था आज वही कंबक्त खुद को कफन में लिपटना चाहता था कभी कभी पलट के देखना चाहता हु, के परछाई साथ तो है ना... या फिर वो भी छुट रही है, अपनोकीं तऱ्हा पराया समजके... अक्सर ऐसा होता है, के केह दु जो बात दिल में है... मगर आदत मजबूर कर देती है, के तेरे दिल को जुबा हि नही... लिखता हु कुछ तो कलम साथ नही देती, कोरे कागज के पन्नें भी आजकल ईस तऱ्हा फडफडाते है... के जिंदगी कि ईस डायरी में, कहाणी भी अधुरी रह जाती है... रेह जाता हू में कई बार ऊस तनहाई में खोकर, के अजीबसा लगने लगता अपने हि आसपास होकर... पुछना चाहता हु ऊनसे आपसे मेरा रिश्ता क्या है, मगर अपना खून आजकल "लाल" कहा होता है... प्यार का नाम सूनकर आज कई बरसो बित गये, पर भुल नही पाता हु वो दिन जब सुबह कि रंगीन रोशनी श्याम तक उजाला देती थी... और आजकल बिना कुछ हुए हि रात हुआ करती है... क्या करु क्योंकी.... मेरी खामोशी में मै बहुत कुछ केहना चाहता हु... गुजरे हर पल को याद करके भुलना चाहता हु..
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