*श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन,* *दानेन पाणिर्न तु कंकणेन,* *विभाति कायः करुणापराणां,* *परोपकारैर्न तु चन्दनेन।।* *अर्थात् :- कानों की शोभा कुण्डलों से नहीं अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है।* *हाथ दान करने से सुशोभित होते हैं, न कि कंकणों से।* *दयालु, सज्जन व्यक्तियों का शरीर चन्दन से नहीं बल्कि दूसरों का हित करने से शोभा पाता है।* *।। श्री विठ्ठल ।।* *।। श्री स्वामी समर्थ ।।*
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